Monday, October 31, 2022

छठ महापर्व पर उमड़ा श्रद्धालुओं की भीड़


दुर्गा विस्तार कालोनी पर उगते सूर्य को अर्पित किया दूसरा अर्घ्य

जयपुर। लोक आस्था का महापर्व डाला छठ सोमवार को उगते हुए सूर्य को दूसरा अर्ध्य देने के बाद यह छठ पूजा महोत्सव सम्पन्न हुआ । सूर्य उपासना के चार दिवसीय महापर्व छठ पूजा की उदीयमान भगवान दीनानाथ जी की सुख-समृद्धि की कामना की। डाला छठ पूजा महोत्सव के मुख्य अतिथि प्रताप सिंह खाचारियावास एवं भाजपा के अरूण चतुर्वेदी रहे ।उन्होंने कहा की छठ माता आपकी नही पूरे विश्व का छठ माता है । मुख्य आयोजन एन बी सी के पीछे दुर्गा विस्तार कालोनी पर हुआ ।जिसमे यह पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया । चार दिवसीय महापर्व का पहला दिन नहाय खाय से शुरू हुआ । लोगे के भीड़ उमड़ पड़ी। रास्ते जाम हो । बिहार समाज संगठन के महासचिव सुरेश पंडित ने बताया कि पुलिस प्रशासन एवं बिहार समाज के स्वयंसेवक ने बड़ी मेहनत की । इस पर्व को देखने के लिए दुर दराज से श्रध्दालु पूजा स्थल पर पहुंचे । इतने पटाके छूटे की दीवाली फीकी पर गया, उस तरह से आतिशबाजी किया गया । इस पर्व की खास रौनक बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बम्बई, दिल्ली, गुजरात, बंगाल पड़ोसी देश नेपाल एवं मॉरिशस, इंग्लैंड सहित अन्य देशो मे देखने को मिलती है । यह व्रत बिहार का सबसे बड़ा व्रत है ‌ यह बहुत ही कठिन साधना के साथ की जाती है ‌। पवित्रता इतनी रखनी पड़ती है किसी ने जान-बूझकर अनिष्ट किया तो कुष्ट जैसे रोग होने की संभावना रहता है समाज के प्रवक्ता संजीव कुमार सिंह ने कहा कि आस्था इतनी होती है जैसे ही मनोकामना पूरी हुई वैसे ही इस व्रत को करने की शुरुआत कर देते है । आपसी प्रेम को भी दर्शाता हुआ यह बहुत बड़ा व्रत है ।जयपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रो में बिहार समाज के बैनर तले छठ पूजा का आयोजन किया गया है । जिसमें बांस के बने हुए टोकरी(डाला या दउरा) भी कहते है बांस से बनी सूप घर - घर में खरीदे जाते है । रविवार को अस्ताचलगामि सूर्य को पहला अर्घ्य अर्पित किया । पूरी रात बिहार समाज संगठन के कार्यकर्ता एवं स्वयंसेवक प्रशासन के साथ व्यवस्था सम्भालने में लगे रहे । शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए जिसमें कृष्ण लीला की झांकी, महाकाल की भष्म आरती एवं कलकत्ता की काली माई की झांकी प्रमुख रूप से दिखाया गया । बिहार के भाषा जैसे कि भोजपुरी, मैथिली, मगही, वंज्जिका,हिन्दी एवं राजस्थानी भाषा में भजन प्रस्तुत किया गया । जिसमे समाज के लोगो ने बढ चढ़कर भाग लिया । प्रसाद रखने के लिए बांस की बनी टोकरी व सूप जिसमे में रखने वाले प्रसाद के रूप से ठेकुआ, गन्ना, गागर (बड़ा नीबू ), नाशपाती, सेव ,केला ,हल्दी, अदरक, मूली,नारियल, केराव, चावल, पान,सुपारी, संतरा,नींबू, शरीफा, फूल एवं मिठाई आदि शामिल होते है । यह सभी रखकर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित किए । सोमवार को जैसे ही सूर्य देव की लालिमा दिखा व्रती ने अर्ध्य देना शुरू किया । व्रत करने वाले ने अपने अपने घर जाकर व्रत खोला । व्रती को चरण शूकर आशीर्वाद लिया । महिलाओ को जोड़ा मांग भरा गया। रात को कोशी भरा गया । जिसके घर में कोई शुभ काम करना जैसे शादी विवाह करना होता है उनके घर में कौशिया भरा जाता है। दूसरा अर्ध्य कार्तिक शुक्ल पक्ष सप्तमी को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर इस महापर्व को समापन किया गया ।

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