Monday, March 21, 2022

रंग राजस्थान के दूसरे दिन हुए दो अलग अलग नाटकों के मंचन



रंग राजस्थान के दूसरे दिन हुए दो अलग अलग नाटकों के मंचन और अभ्यस्त पठन "झलकारी" की प्रस्तुति, जहाँ एक और नाटक "अग्नि और बरखा" में दिखा वर्षा के लिए संघर्ष और प्रेम की अद्भुत कहानी, वही दूसरी और नाटक "मीरा" में दिखी भक्ति और कृष्ण के प्रति प्रेम में तल्लीनता

महोत्सव के बातचीत सत्र "रंग चौपाल" में मेहमान रहे बॉलीवुड के प्रसिद्ध कास्टिंग निर्देशक और फिल्म "दिल बेचारा" के निर्देशक "मुकेश छाबरा" जिन्होंने "कास्टिंग में रंगमंच का महत्व" विषय पर चर्चा की
जयपुर। 
कला संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग एवं जयपुर की रंग मस्ताने संस्था द्वारा जवाहर कला केंद्र (जेकेके) के सहयोग से आयोजित रंगमंच और लोक महोत्सव रंग राजस्थान का सोमवार को दूसरा दिन था। जवाहर कला केंद्र में चल रहे इस महोत्सव में कल नाटक "अग्नि और बरखा" का मंचन हुआ। इसके लेखक है गिरीश कर्नाड और ये नाटक स्वाति दुबे द्वारा निर्देशित था। जो की जबलपुर से अपना नाटक लेकर आईं थी। नाटक के सभी कलाकारों ने अपने किरदार बखूबी निभाए और दर्शकों से भी इसे खूब सराहना मिली।
शाम 4.30 बजे जवाहर कला केंद्र के रंगायन मंच पर आयोजित रंग चौपाल में कास्टिंग और फिल्म निर्देशक मुकेश छाबरा मेहमान रहे। मुकेश छाबरा हिंदी फिल्म जगत के बड़े कास्टिंग डायरेक्टर है और इन्होंने कई फिल्मों में अभिनय भी किया है। इन्होंने बॉलीवुड की दंगल, रॉकस्टार, जय हो, चेन्नई एक्सप्रेस, फोर्स, गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी कई बड़ी फिल्मों की कास्टिंग की है और रंग दे बसंती, गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्मों में ये अभिनय कर चुके है। 2020 में आई सुशांत सिंह राजपूत की अंतिम फिल्म "दिल बेचारा" से इन्होंने बतौर फिल्म निर्देशक के तौर पर अपनी शुरुआत की है। रंग चौपाल के मॉडरेटर जयपुर के रंगमंच निर्देशक अभिषेक गोस्वामी रहे। अभिषेक गोस्वामी राष्ट्रीय नाट्य अकादमी में मुकेश छाबरा के सहपाठी भी रहें है। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि किस तरह वह बचपन से रंगमंच से जुड़े हैं एवं आज भी मुम्बई में रंगमंच करते हैं। साथ ही उन्होंने अपने कास्टिंग निर्देशक बनने के सफ़र को दर्शकों के साथ साँझा किया। बातचीत सत्र में कास्टिंग में रंगमंच का महत्व पर चर्चा हुई। जिसके विषय में मुकेश छाबरा ने बताया कि थियटर का कलाकार ज़्यादा भरोसेमंद होता हैं लेकिन वह कास्टिंग किरदार के सहजता के अनुसार करते हैं।मुकेश छाबरा  ने बताया कि जल्द ही जयपुर में भी उनकी कास्टिंग कम्पनी आ रही हैं।
इसके बाद शाम 7 बजे जेकेके के रंगायन में मंचित हुए नाटक "मीरा" ने भी दर्शकों के दिल पर अपनी एक अलग छाप छोड़ी और कलाकारों ने उनसे खूब तालियां बटोरी। ये नाटक जयपुर के निर्देशक साहिल आहूजा द्वारा निर्देशित था। इस नाटक की खास बात ये रही की मीरा का किरदार करने वाली कोई स्त्री नहीं बल्कि पुरुषों ने ही इसे बेहद सुंदर तरीके से निभाया। अपने नाटक को लेकर निर्देशक ने भी कहा है कि प्रेम उनके लिए किसी खूबसूरत भावना की बजाय एक जिज्ञासा रहा हैं। खासकर तब जब ये उससे हो जिसके होने या न होने का पता भी न हो।
वहीं इसके बाद शाम 7.30 बजे हुई मुंबई से आईं नेहा सिंह की अभ्यस्त पठन झलकारी की प्रस्तुति। अभस्यत पठन के दौरान अभिनेताओ का समूह किसी कहानी के एक अंश को पढ़ने का अभिनय करता हैं। झलकारी दलित योद्धा झलकारी बाई की वास्तविक जीवन कहानी पर आधारित है, जो रानी लक्ष्मी बाई की महिला सेना थी।  यह कहानी 1857 के युद्ध के दौरान दो महिलाओं के बीच संघर्षों, विजयों और कॉमरेडरी को दर्शाती है, जो स्वतंत्रता के लिए भारत का पहला संघर्ष था।
कल 22 मार्च, 2022 को दो नाटक खेले जाएँगे। दोपहर 3 बजे उदयपुर से निर्देशक कविराज लायिक द्वारा निर्देशित नाटक ब्रह्नलल्ला जेकेके के कृष्णायन में खेला जाएगा और उसके बाद शाम 6 बजे बीकानेर से उत्तम सिंह द्वारा निर्देशित हास्य नाटक दावत-ए-इश्क़ खेला जाएगा।
नाटक अग्नि और बरखा का सार -
गिरीश कर्नाड द्वारा लिखित यह नाटक “ अग्नि और बरखा “ का प्रारम्भ होता है आकाल होता है जहाँ साथ वर्षों से वर्षा की एक बूँद तक नहीं, तब पानी के देवता मेघराज इंद्र को प्रसन्न करने के लिए राजमहल में शुरू होता है महायज्ञ जिसमें मुख्य पुरोहित बनने के लिए रैभ्य, रैभ्य का भाई (यवक्री के पिता) तथा परावसु (रैभ्य का बड़ा पुत्र) के बीच द्वन्द होता है तथा परावसु के चुने जाने पर उसके और उसके पिता के बीच द्वेषपूर्ण सम्बन्ध हो जाते हैं | परावसु इस यज्ञ के लिए सबको अनदेखा कर देता है, अपनी पत्नी विशाखा को भी | यवक्री (विशाखा का पूर्व प्रेमी और परावसु का चचेरा भाई) 10 वर्षों की तपस्या के बाद इंद्र से अखंड ज्ञान लेकर लौटता है, वो रैभ्य से अपने पिता के अपमान का प्रतिशोध लेना चाहता है | इस सत्ता और प्रतिरोध के विपरीत अरवसु (परावसु का छोटा भाई, रैभ्य का छोटा बेटा) का अभिनय एवं नित्तिलाई (निषाद कन्या) के प्रति सच्चे प्रेम की कथा चलती है | मानवीय जाटलताओं, घृणा और पदलोलुप्ता के संघर्ष से शुरू होकर यह नाटक प्रेम पर ख़तम होता है और उच्च मानवीय मूल्यों को स्थापित करता है | अंततः 10 वर्षों के बाद वर्षा होती है |
नाटक मीरा का सार -
मीरा शब्दो का एक ऐसा मायाजाल हैं, जिसे बहुत ही सुुंदर तरीके से गुरुचरण दास जी ने पिरोया हैं। ये एक ऐसे नवविवाहिता की कहानी है जिसे पता ही नही है, की उसका भाग्य उसे 16वी शताब्दी के रस्म-रिवाज़ से दबे मेवाड़ में ईश्वर का भक्त बना रहा है, और उसके वजूद की तलाश में भी भेज रहा है। शुरुआत में, मीरा और उसका जांबाज पति राणा इस जिस्मानी छुअन से शममशार होते हैं, ऐसी छुअन जो भावनाओ को रास्ता दिखाती है। जल्द ही राणा दुनियादारी में व्यस्त हो मीरा को भूल जाता है, और मीरा भी एक तन्हा बीवी की मायसूी को अपना लेती है। एक नाकामी इस रिश्ते को और भी घेर लेती है, जब मीरा रियासत को एक बेटा नही दे पाती हैं। मीरा के बारे में ये अफवाहे फैलने लगती हैं, की वो एक बांझ हैं। इन सब से तंग आकर मीरा अपने रिश्तेदार जय की तरफ झुकती तो है, लेकिन उसे पनाह मिलती हैं, कृष्ण में। (कृष्ण - प्रेम का ईश्वर।) मीरा में एक ज़ोरदार बदलाव आता हैं।
दूसरों के लिए वो एक बांझ बीवी से एक ऐसी औरत में तब्दील हुई जिसे भूत प्रेतों ने जकड़ लिया था। मीरा के लिए ये तब्दीली जिंदगी के खोखले बुलबुले से इश्क़ की पक्की बुनियाद की ओर थी। वो डूब चुकी थी इस इश्क़ में। राणा मीरा पर शक करता हैं, और उसे चौंका देने की कोशिश में ये पाता है, की वो तो कृष्ण से बात कर रही है। अपने ईश्वर के लिए जो प्रेम मीरा के दिल में पनप रहा है उसे जीतने की कोशिश करना और आखिरकार उसे जीतना ही मीरा को पूर्ण बनाता है। मीरा का मीरा बाई होना ही उसकी जीत है। मीरा अब दैवीय शांति में है।
झलकारी का सार -
झलकारी दलित योद्धा झलकारी बाई की वास्तविक जीवन कहानी पर आधारित है, जो रानी लक्ष्मी बाई की महिला सेना थी।  यह कहानी 1857 के युद्ध के दौरान दो महिलाओं के बीच संघर्षों, विजयों और कॉमरेडरी को दर्शाती है, जो स्वतंत्रता के लिए हमारा पहला संघर्ष था।

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