Sunday, February 6, 2022

जेकेके में राजस्थान की फ्रेस्को पेंटिंग्स की विशेषताओं और तकनीकों पर हुई चर्चा


जयपुर।
 आज़ादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत जवाहर कला केंद्र (जेकेके) द्वारा शनिवार को संवाद श्रृंखला के एक भाग के रूप में 'फ्रेस्को पेंटिंग्स ऑफ राजस्थान' विषय पर जेकेके के फेसबुक पेज पर वर्चुअल चर्चा का आयोजन किया गया। इस संवाद कार्यक्रम में फ्रेस्को पेंटिंग्स के विशेषज्ञ एवं प्रसिद्ध कलाकार डॉ नाथूलाल वर्मा और समदर सिंह खंगारोत 'सागर' शामिल हुए। चर्चा के दौरान भित्ति चित्रकला में फ्रेस्को पेंटिंग व उसकी तकनीकों एवं विशेषताओं के बारे में विस्तार से चर्चा की गई। सेशन का संचालन श्री अब्दुल लतीफ उस्ता ने किया। फ्रेस्को पेंटिंग्स के विशेषज्ञ एवं प्रसिद्ध कलाकार डॉ नाथूलाल वर्मा ने भित्ति चित्रकला के बारे में बताने के साथ शुरूआत की। उन्होंने बताया कि भित्ति चित्रकला यानि दीवार पर किसी भी माध्यम से की जाने वाली प्राचीन कला है। इसके उदाहरण चट्टानों और गुफाओं की दीवारों पर बने चित्रों के रूप में हमें देखने को मिलते हैं। भित्ति चित्रकला में दीवार को मुख्य अंग माना जाता है। वहीं फ्रेस्को पेंटिंग के बारे में उन्होंने बताया कि किसी भवन के दीवार पर ताजा या गीले चूने के प्लास्टर पर किया जाने वाला चित्रण फ्रेस्को है। फ्रेस्को पेंटिंग की 2 तकनीकें हैं- बुनो फ्रेस्को और सेको फ्रेस्को। बुनो फ्रेस्को जिसे आला-गीला पद्धति भी कहा जाता है, इसमें गीले धरातल पर ही चित्रण और रंग किया जाता है। फिर विशेष टूल्स के माध्यम से इसे पीटा जाता है, जिससे रंग प्लास्टर में ही समाहित हो जाता है। यह पद्धति सबसे स्थायी और टिकाऊ मानी जाती है। वहीं सेको फ्रेस्को के बारे में उन्होंने बताया कि इसमें बुनो फ्रेस्को की तरह ही भित्ति को तैयार कर उसे सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है। फिर चित्रकार उसमें कभी भी रंग भर सकता है। इसमें खनिज के साथ ही रसायनिक, वनस्पति रंगो का इस्तेमाल किया जाता है और इन रंगों को पक्का करने के लिए इसमें गोंद भी मिलाया जाता है। ये तकनीक बूनो फ्रेस्को से कम स्थायी मानी जाती है। इन तकनीकों के कार्य हमें मंदिरों, महलों या हवेलियों में देखने को मिलता है। कलाकार डॉ नाथूलाल आगे बताया कि भित्ति चित्र में तकनीक का विशेष महत्व है। यह चित्रकला बहुत श्रमसाध्य है, इसमें चित्रकार को इस चित्रकला की पूरी जानकारी होनी चाहिए। सही तकनीक से बने चित्र ही लम्बे समय तक टिक पाते हैं। उन्होंने भित्ति चित्रकला में उपयोगी जानकारी देते हुए कहा कि सबसे पहले चित्रकार को सही भित्ति (दीवार) का चयन करना चाहिए। दीवार पर कोई सीलन या लकीर नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही चित्रकार को रंगों और उपकरणों की भी पूर्ण और सही जानकारी होनी चाहिए। भित्ति चित्र बनाने में उपयोग आनेवाली सामग्री के बारे में उन्होंने बताया कि इसमें चूना, संगमर्मर का चूरा और रंग सबसे महत्वपूर्ण हैं। विख्यात कलाकार समदर सिंह खंगारोत 'सागर' ने कहा कि राजस्थान एक ऐसा प्रांत है जहां कला एवं संस्कृति के विभिन्न आय़ामों का प्रदर्शन किया गया है। प्रदेश के हर क्षेत्र में अलग-अलग विधाओं का चित्रण है। उन्होंने कहा हमारे यहां ऐसा माना जाता था कि दीवारों व भित्तियों को सूना नहीं छोड़ा जाता है, इसलिए ही लगभग अधिकांश क्षेत्रों में लोगों ने अपने स्तर और सुविधा अनुसार दीवारों को सजाया हुआ है। लोगों ने भित्ति चित्र के साथ-साथ मांडना से भी दीवारों को सजाया है। मांडना भी दीवारों को सजाने की एक श्रेष्ठ तरीका है। जयपुर की बात करते हुए उन्होंने कहा कि गलता जी में बने मंदिरों, पुरोहित जी की हवेली, नाना जी की हवेली, आदि कई पुरानी हवेलियों, महलों और मंदिरों में भी अलग-अलग तकनीक से बने पुराने भित्ति चित्र देखने को मिलते हैं। वहीं उन्होंने बताया कि इसका सबसे अच्छा उदाहरण शेखावटी क्षेत्र में देखने को मिलता है जहां बड़ी-बड़ी हवेलियों और भवनों में इस तरह की चित्रकला देखने को मिलती है। इसके साथ ही उन्होंने जयपुर सहित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में इस चित्रकला के इतिहास और विशेषताओं की जानकारी दी।

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