Monday, February 14, 2022

जेकेके में राजस्थानी रंगमंच के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से हुई चर्चा


जयपुर।
 आज़ादी का अमृत महोत्सव के तहत जवाहर कला केंद्र (जेकेके) द्वारा शनिवार को 'राजस्थानी रंगमंच- चुनौतियां एवं संभावनाएं' विषय पर संवाद शृंखला का आयोजन जेकेके के फेसबुक पेज पर वर्चुअली किया गया। कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ रंगकर्मी, निर्देशक व तमाशा गुरू  वासुदेव भट्ट ने राजस्थानी रंगमंच के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की और अपने विचार साझा किए। वे अभिनेता व लेखक नवल किशोर व्यास से चर्चा कर रहे थे।  वासुदेव भट्ट ने रगंकर्मी के रूप में अपने अनुभव पर बात करते हुए कहा कि "जिंदगी में मैंने नाटक ही ओढ़ा है, नाटक ही पहना है और नाटक ही बिछाया है। नाटक मेरी रगों में बसता है। जब से मैंने होश संभाला कला मेरे चारों ओर थी। मैंने बचपन से सरगमों को सुना और पढ़ा है। कला और संगीत संस्कारों के रूप में मेरे अंदर बसे हैं।" करीब 250 वर्ष पुरानी लोक नाट्य शैली 'जयपुर तमाशा' के बारे में श्री भट्ट ने बताया कि पीढ़ियों से उनका परिवार जयपुर में 'तमाशा' प्रस्तुत करता आ रहा है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में विभिन्न लोक नाट्य अलग-अलग भाषाओं में होते हैं, लेकिन जयपुर तमाशा शुद्ध हिन्दी खड़ी बोली और शुद्ध शास्त्रीय संगीत में होता है। नाटक में अभिनय की शुरूआत करने के बारे में उन्होंने बताया कि उन्हें फिल्मों और गानों से एक्टिंग में रूची बढ़ी। उन्होंने बीकानेर में गलियों और टाउन हॉल में कई नाटकों में अभिनय किया। उसके बाद वे जयपुर लौट आए और यहां रेडियो में काम किया। रेडियो नें नाटक प्रस्तुत करते हुए उनके बोलने के ढंग और उच्चारण में काफी सुधार आया। जिसके बाद उन्होंने कई शहरों में बड़े-बड़े नाटकों में अभिनय किया और स्वयं को एक प्रसिद्ध रंगकर्मी के रूप में स्थापित किया। रंगमंच की चुनौतियों के बारे में  वासुदेव भट्ट कहा कि नाटक सिर्फ वही कर सकता है जिसमें रंगमंच को लेकर जुनून और पागलपन हो। आजकल अभिनय के विभिन्न साधनों जैसे कि फिल्म, टीवी, वेब के बावजूद जो नाटक कर रहा है, वे रंगमंच को जीवित रखने के लिए बेहद अच्छा कार्य कर रहे हैं। उन्होंने नाटकों में तकनीकों के उपयोग किए जाने के बारे में कहा कि जो बिना किसी तकनीकों की मदद से प्रस्तुत किया जा सके वह सबसे बेहतरीन नाटक और अभिनेता है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले के मुकाबले आज के समय में रंगकर्मियों में अनुशासन की कमी है। श्री वासुदेव ने इस पर जोर दिया कि अगर स्थानीय भाषा में नाटक लिखा और प्रस्तुत किया जाए, तो वहां के दर्शकों में नाटक को देखने के लिए रूचि बढ़ेगी। इससे थिएटर का विकास होगा और लोगों को अपनी भाषा से प्रेम होगा। संवाद के दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि कार्यशालाओं और थियेटर फेस्टिवल्स के आयोजन के माध्यम से थियेटर को बढ़ावा मिलता है और आमजन में भी थियेटर के प्रति रूचि पैदा होगी।

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