Sunday, February 20, 2022

जेकेके में राजस्थानी कलाओं के सौंदर्य, विशिष्टता और विविधता पर हुई चर्चा


जयपुर।
 आज़ादी का अमृत महोत्सव के तहत जवाहर कला केंद्र (जेकेके) द्वारा 'राजस्थानी कलाओं का सौंदर्य-शास्त्र' विषय पर संवाद शृंखला का आयोजन शनिवार शाम को जेकेके के फेसबुक पेज पर वर्चुअली किया गया। कार्यक्रम में कला समीक्षक, यात्रा वृत्तान्तकार व कवि, डॉ. राजेश कुमार व्यास ने 'राजस्थानी कलाओं का सौंदर्य-शास्त्र' विषय पर प्रकाश डाला व अपने विचार साझा किए। वे क्यूरेटर, जेकेके, श्री अब्दुल लतीफ उस्ता के साथ चर्चा कर रहे थे। संवाद के दौरान डॉ. राजेश कुमार व्यास ने राजस्थानी कलाओं के सौंदर्य, विशिष्टता, विविधता, और इतिहास पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि राजस्थान की चित्रकला हमेशा से समृद्ध रही है। राजस्थानी चित्रकला भारतीय चित्रकला है।

राजस्थान की चित्रकला के सौंदर्य पक्ष की बात करते हुए डॉ. व्यास ने कहा कि राजस्थानी चित्रकला की विशेषता यह भी है कि उसमें केवल चित्र नहीं है, इसमे विभन्न कलाएं जैसे कि संगीत, नृत्य, नाट्य, वास्तु आदि भी चित्र में देखने को मिलते हैं। ऐसा माना गया है कि चित्रकला, अन्य कलाओं के मेल से ही पूर्णता को प्राप्त करती है। राजस्थानी चित्रकलाएं विभिन्न कलाओं के मेल से बनी हैं और इसमें चित्रकार अपने चित्र के माध्यम से संवाद कर रहा है। राजस्थानी कलाओं की विविधता की बात करते हुए डॉ. व्यास ने कहा कि राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्र की चित्रकलाओं में वहां का परिवेश और संस्कृति प्रदर्शित होती है। राजस्थान के बिकानेर, अलवर, मारवाड़, मेवाड़, बूंदी, कोटा आदि विभिन्न चित्रशैलियों में प्रमुख बात यह रही है कि चित्रकारों ने सबसे अधिक राधा-कृष्ण के चित्र बनाएं हैँ। इन सभी चित्रशैलियों की खासियत यह है कि चित्रकारों ने अपने चित्रों में स्थानीय परिवेश के साथ रंग-रेखाओं का सुंदर संयोजन किया है।
राजस्थान की प्रसिद्ध चित्रशैली बनी-ठनी पर बात करते हुए डॉ. व्यास ने कहा कि इसमें चित्रकार द्वारा बड़ी ही खूबसूरती से राधा का रूपांकन और अंलकरण किया गया है। चित्रकार ने सौंदर्य को बनी-ठनी के माध्यम से जीवंत किया है। उन्होंने आगे कहा कि राजस्थानी चित्रकला का सौंदर्य अगर किसी को महसूस करना है तो उन्हें बनी-ठनी चित्रकला को देखना चाहिए। कला के सौंदर्य बोध पर डॉ. व्यास ने कहा कि अगर चित्रकार किसी चीज की अनुभूति कर चित्रण करता है, तो वो चित्र अधिक आकर्षक बनकर आता है। इसी संदर्भ में राजस्थानी चित्रशैलियों के बारे में उन्होंने कहा कि कलाकारों ने किसी अन्य शैली का अनुकरण नहीं किया है, बल्कि स्थानीय परिवेश, रंगों और मूल हावों भावों को अपने चित्रों में उकेरा है। जिससे कि कला का सौंदर्य बोध होता है, वहीं अनुकरण कला के सौंदर्य को बाधित करती है। संवाद के दौरान उन्होंने आर्ट एप्रीसिएशन के बारे में भी बात की कि कैसे दर्शकों को कला के करीब लाया जाए और उनमें कला के प्रति रूचि पैदा की जाए।

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