Sunday, December 19, 2021

जयरंगम के दसवें संस्करण : ऑनलाइन खेले गए दो नाटक

जयपुर। अखिल भारतीय नाट्य समारोह जयरंगम के दसवें संस्करण के तीसरे और अन्तिम दिन रविवार को दिन की भव्य शुरुआत मॉर्निंग रागा से हुई। इस मौके पर बनारस के तबला वादक निर्मल यदुवंश ने अपने साथी कलाकार की हारमोनियम पर संगत के साथ शानदार तबला वादन की प्रस्तुति दी। उसके बाद मध्य प्रदेश मालवा के कालूराम बामनिया ने अपने भाव विभोर कर देने वाली लोक गायन की प्रस्तुति दी।

ऑनलाइन खेले गए दो नाटक

अन्तिम दिन जाने-माने फिल्म अभिनेता और नाट्य लेखक व निर्देशक मकरंद देशपाण्डे के लिखित, निर्देशित और अभिनीत नाटक ‘राम’ और अजितेश गुप्ता निर्देशित संगीतमय नाटक ‘रेल गाड़ी कैसो न सुन्दर’ के ऑन लाइन मंचन किए गए। उल्लेखनीय है कि मकरंग देशपांडे के नाटक ‘राम’ के जवाहर कला केन्द्र में हुए ऑफ लाइन मंचन से जयरंग का आगाज हुआ था। यह नाटक एहसास करा जाता है कि भगवान दिल और दिमाग में रहते हैं,आपकी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है। ‘राम’ दुनिया के एक अंधकार स्वरूप को प्रदर्शित करता नजर आया। राम भक्त जिस रामराज्य, आदर्शमयी और पौराणिक दुनिया का सपना देख रहे हैं वह वर्तमान में असंभव सा ही प्रतीत हो रहा है, सिर्फ धर्म के नाम पर हिंसा ही हो रही है। नाटक में मकरंद देशपांडे ने अपने किरदार का मंच पर इतना जीवंत अभिनय किया कि हर रंगमंच प्रेमियों ने तालियों से स्वागत किया। राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर गहरा प्रहार करता इस नाटक का मंचन बहुत सफल रहा।
बड़ी-बड़ी बातों पर नहीं मैं सिर्फ परिश्रम पर भरोसा करता हूं- पियूष मिश्रा
इससे पहले जाने-माने रंगकर्मी, अभिनेता, गीतकार और संगीतकार पीयूष मिश्रा जूम एप के जरिए आमन्त्रित सौ नाट्य प्रेमियों से रूबरू हुए। इस मौके पर उनसे थिएटर के अनेक छात्रों ने अभिनय और रंगमंच से जुड़े कई सवाल पूछे जिनका उन्होंने बड़े साफगोई ईमानदारी से जवाब दिए। उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण बहुत जरूरी होता है इससे आपका दिमाग और सोच खुलती है आप हर साल बेहतर और बेहतर करते हैं। इसके लिए जरूरी नहीं की एनएसडी मैं ही प्रवेश मिले अगर कुछ हासिल करने की चाहो तो आप कहीं पर भी रहकर अपने आप को प्रशिक्षण दे सकते हैं और अपना मुकाम हासिल कर सकते हैं जैसे मनोज बाजपेई। उन्होंने अपनी जगह खुद बनाई । सिनेमा और थिएटर में अंतर बताते हुए उन्होंने कहा की सिनेमा में काफी बंधन है आपको अपने हर सीन से पहले कभी मेकअप मैन रोकता है, तो कभी कुछ कैमरामैन कभी डायरेक्टर की बात सुननी होती है। थिएटर में सिर्फ आपको अपने पर भरोसा करना होता है, आपको आपके डायलॉग्स याद होने चाहिए ,आपको अपनी एक्टिंग पर भरोसा होना चाहिए क्योंकि थिएटर में माफी की कोई गुंजाइश ही नहीं होती।
एक छात्र के सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि बड़ी-बड़ी बातों से कुछ हासिल नहीं होता सिर्फ परिश्रम पर ही भरोसा करना होता है और आपको घर के सुरक्षा घेरे से बाहर निकलने की कोशिश करनी चाहिए। कुए के मेंढक वन कर कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है।
किसी काम को करने का उद्देश्य गहरा होना चाहिए -सुनील शानबाग
इसके बाद नाट्य निर्देशक ,पटकथा लेखक और वृत्तचित्र फिल्म निर्माता सुनील शानबाग नाट्य प्रेमियों से रूबरू हुए। उन्होंने कहा कि पहले आपके दिमाग में एक पुख्ता आइडिया होना चाहिए ,उस नाटक को करने के पीछे एक गहरा उद्देश्य होना चाहिए उसके बाद नाटक का मंचन किया जाना चाहिए। पिछले दस- बारह साल से मैं इसी तरीके से पहले आईडिया क्रिएट करता हूं और उसके बाद नाटक । उन्होंने बताया कि करीब चार-पांच साल पहले पृथ्वी थियेटर फेस्टिवल में उनसे कहा गया कि पृथ्वीराज कपूर के किसी नाटक का फिर से मंचन कीजिए। जब उन्होंने उनके नाटक पढ़ें तो उन्हें 1945 का दीवार नाटक बहुत पसंद आया। एक सिंपल सी कहानी के जरिए उस समय पार्टीशन के विरोध में यह नाटक खेला गया था और यह नाटक इतना भावुक कर देने वाला था की दर्शक मंच पर खींची हुई दीवार को आकर तोड़ जाते थे।
जयरंगम की जय पताका ऊंची ही रहनी चाहिए और ऊंची ही रहेगी -आलोक चटर्जी
इसके बाद रंग प्रशिक्षण के महत्व के बारे में बताते हुए आलोक चटर्जी ने कहा कि यह अभिनेता के विकास के लिए जरूरी है कि उसे इस प्रशिक्षण से गुजर ना चाहिए। आपके पूरे व्यक्तित्व, आपकी आवाज, बॉडी लैंग्वेज का अभ्यास ,आपकी कल्पनाशीलता और आपकी एकाग्रता बढ़ाने की प्रक्रिया को ही रंग प्रशिक्षण कहते हैं। किरदार निभाते वक्त एक अभिनेता को जीवंत उपस्थिति देनी होती है। इसके लिए उसे चरित्र को पकड़ना आना चाहिए ,उसके इमोशंस, बॉडी लैंग्वेज और डायरेक्टर के दिए डायलॉग्स को सही तरीके से पढ़ना और याद करना चाहिए।

शाम छ बजे रेलगाड़ी कैसन सुंदर नाटक का मंचन हुआ। जिसके लेखक और निर्देशक है अजितेश गुप्ता। करीब आधे घंटे खेले गए इस नाटक मैं उस समय का जिक्र है जब 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित चाय बागानों में मजदूरों को उन बगानों तक ले जाया जाता था और उन्हें साम्राज्य अपना बंधुआ गुलाम बना देता था। उस समय के रेलवे के जटिल नेटवर्क के खिलाफ खेला गया है नाटक। भारत के लोक गीतों के जरिए बीना की कहानी के रूप में इस नाटक को प्रस्तुत किया गया।

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