Thursday, October 21, 2021

आत्मनिर्भर भारत के लिए फार्म मेकेनाइजेशन

मुंबई, 21 अक्टूबर, 2021: फार्म मेकेनाइजेशन को दुनिया भर में कृषि पैदावार को बढ़ाने वाले एक प्रमुख उपकरण के तौर पर पहचाना गया है। अनेक अध्‍ययनों से पता चलता है कि पैदावार में वृद्धि और फार्म मेकेनाइजेशन के बीच सीधा सह-संबंध है जिसका किसानों को कई आर्थिक एवं सामाजिक लाभ भी मिलता है। हालांकि भारत में फार्म मेकेनाइजेशन ने हाल के वर्षों में मजबूती से कदम बढ़ाये हैं, लेकिन अभी भी इसे लंबा रास्ता तय करना बाकी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े ट्रैक्टर बाजारों में से एक है, और यह अत्यधिक संगठित भी है। हालांकि, विकसित देशों की तुलना में भारत में मशीनीकरण का स्तर निम्न है।

वैश्विक दृष्टिकोण से देखें तो ट्रैक्टर उद्योग लगभग 60 बिलियन अमरीकी डालर का है, और कृषि मशीनरी उद्योग अतिरिक्त 100 बिलियन अमरीकी डालर का है। इसके विपरीत, भारतीय ट्रैक्टर उद्योग लगभग 6 बिलियन अमरीकी डालर का है और कृषि मशीनरी उद्योग केवल 1 बिलियन अमरीकी डालर का है। इन आंकड़ों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि भारत ट्रैक्टरीकृत तो हुआ है, लेकिन अभी तक मशीनीकृत नहीं हुआ है।

हेमंत सिक्का, फार्म इक्विपमेंट सेक्टर, महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड कहते है जहां ट्रैक्‍टर एक प्राइम मूवर है, वहीं कृषि मशीनरी मूल्‍य श्रृंखला में जमीन को तैयार करने से लेकर बुआई, फसल-कटाई और कटाई के बाद तक यंत्रीकरण शामिल है। उत्‍पादन चक्र के प्रत्‍येक चरण में, कृषि उपकरणों का उपयोग कृषि क्षमताओं को बढ़ा देता है। और इससे केवल श्रम अवधि और फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान ही नहीं घटता है, बल्कि दीर्घकालिक रूप से उत्‍पादन लागत भी घटती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्र जैसे देश पूरी तरह से मशीनीकृत हैं, जबकि चीन और जापान जैसे देशों में भी कृषि मशीनरी की अधिक पैठ देखी गई है। इसकी तुलना में, भारतीय कृषि क्षेत्र अभी भी पीछे है और यहां कृषि उपकरणों में वृद्धि की आवश्यकता है।

भारत पर व्‍यापक दृष्टि से नज़र दौड़ाएं तो पता चलता है कि 85% से अधिक भारतीय किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है, लेकिन उनके पास कुल फसल क्षेत्र का केवल 47.3% हिस्सा ही है। ये छोटे किसान लागत, कम उपज और आय जैसी समस्‍याओं के चलते इन मशीनीकरण तकनीकों को वहन कर पाने में असमर्थ हैं। परिणामस्वरूप, भारतीय खेतों पर मशीनीकरण की समग्र दर कम है।

हालांकि कुछ स्तर तक यंत्रीकरण (ट्रैक्‍टर्स को छोड़कर) तो है, लेकिन यह जमीन की तैयारी तक सीमित है। कई अन्‍य परिचालन कार्यों के लिए, सरल यंत्रों (इंप्लिमेंट्स) का उपयोग किया जाता है, या मानव बल द्वारा कार्य किया जाता है। साथ ही, क्षेत्रवार देखने पर यंत्रीकरण के इस स्‍तर में भी काफी भिन्‍नता है। भारत के उत्‍तरी राज्‍यों जैसे पंजाब, हरियाणा और उत्‍तर प्रदेश का क्षेत्र बेहद उत्‍पादक होने और श्रम बल की घटती उपलब्‍धता के चलते वहां उच्‍च स्‍तर का मेकेनाइजेशन है।

यदि हम देखें तो यह स्‍पष्‍ट होता है कि महामारी ने ऐसे कई कारकों को जन्‍म दिया है जैसे कि श्रमिक प्रवास जिनके चलते यंत्रीकरण (मेकेनाइजेशन) को अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है और यही कारण है कि वित्‍त वर्ष’21 में फार्म मशीनरी की बिक्री में बहुत अच्‍छी वृद्धि हुई है। जहां तक ट्रैक्‍टर्स का संबंध है, पहली बार वित्‍त वर्ष’21 में ट्रैक्‍टर इंडस्‍ट्री ने 9 लाख के सर्वोच्‍च वॉल्‍यूम के आंकड़े को छुआ है। पिछले वर्ष लॉकडाउन के चलते अप्रैल और मई में उत्‍पादन में नुकसान होने के बाद की यह स्थिति है। तो, सिर्फ 10 महीने काम करने के बावजूद, इंडस्‍ट्री 27% बढ़ी है।

भारत में कृषि मशीनरी उद्योग मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में असंगठित वर्कशॉप्‍स द्वारा निर्मित निम्न प्रौद्योगिकी उपकरणों पर केंद्रित है। इसलिए, इन उत्पादों के लिए विनिर्माण उद्योग को उसी तेजी से बढ़ने की जरूरत है, जिस तेजी से ट्रैक्‍टर उद्योग बढ़ा है ताकि ग्रामीण आय को बढ़ाते हुए विनिर्माण विकास, प्रौद्योगिकी विकास, निर्यात, वित्त और रोजगार बढ़ सके

इस बात के बढ़ते हुए अनुभव के साथ कि उपज और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कृषि मशीनीकरण अनिवार्य है, निर्माता उन तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो कि अफोर्डेबल, एसेसिबल होने के साथ अनुकूलित हैं, और यह विशेष रूप से छोटे किसानों के लिए हैं। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारें, स्टार्ट-अप सहित कई निजी कंपनियों के साथ मिलकर, देश के लिए आवश्यकता-आधारित, क्षेत्रीय रूप से विभेदित कृषि मशीनरी और मशीनीकरण समाधान के विकास की दिशा में काम कर रही हैं। इस वजह से आने वाले वर्षों में मशीनीकरण में काफी तेजी आने की उम्मीद है।

विशेषीकृत कृषि मशीनरी को सीएचसी (कस्टम हायरिंग सेंटर) के माध्यम से भी लोकप्रिय बनाया जा सकता है, जिससे किसान इन्‍हें वहन भी कर पायेंगे और ये सुलभ भी होंगी और जिससे छोटे और सीमांत किसानों के बीच कृषि उपकरणों की पैठ बढ़ेगी, और इससे भारतीय कृषि क्षेत्र और इसके किसानों को 'आत्मनिर्भर' बनाने में महत्वपूर्ण रूप से योगदान दिया जा सकेगा।

 

 

 

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