Thursday, September 16, 2021

इंडियन वुमेन्स हेल्थ रिपोर्ट 2021 ने भारत में स्वास्थ्य समस्याओं के चलते व्हाइट-कॉलर जॉब्स में महिलाओं द्वारा सामना किये जा रहे पक्षपात, लांछन और गलत धारणाओं का खुलासा किया

पुणे, 16 सितंबर, 2021: इंडियन वुमेन्‍स हेल्‍थ रिपोर्ट 2021, जिसमें सात शहरों के 25 से 55 वर्ष की 1000 कामकाजी महिलाओं का सर्वेक्षण किया गया, ने खुलासा किया है कि सर्वेक्षण में शामिल करीब आधी महिलाएं समाज में प्रचलित गलत धारणाओं के चलते स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के बारे में बात करने में सहज महसूस नहीं करती हैं।

एमक्‍योर फार्मास्‍यूटिकल्‍स द्वारा इप्‍सोस रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड (इप्‍सोस इंडिया) के साथ मिलकर यह अध्‍ययन कराया गया है। यह अध्‍ययन कामकाजी महिलाओं के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और चिकित्सा दृष्टिकोण पर अंतर्दृष्टि प्राप्त करने और अंततः विभिन्न हितधारकों से जुड़े समाधान खोजने के उद्देश्य से किया गया है।

इस सर्वेक्षण के जरिए, व्‍हाइट-कॉलर जॉब्‍स करने वाली महिलाओं ने उनके द्वारा सामना की जाने वाली स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी गलत धारणाओं के बारे में बताया और यह भी बताया कि किस तरह से ये धारणाएं सामाजिक दबाव एवं पेशेवर समस्‍याएं पैदा करती हैं।

महत्‍वपूर्ण निष्‍कर्ष

  • 90% कामकाजी महिलाओं को पारिवारिक/व्यक्तिगत और व्यावसायिक दायित्वों के बीच तालमेल बिठाने में हितों के टकराव का सामना करना पड़ता है
  • 86% कामकाजी महिलाओं ने अपने सहकर्मियों/रिश्तेदारों/दोस्तों को कार्यबल से बाहर होते देखा है, जिनमें से 59% ने 'पीसीओएस, गर्भावस्था और एंडोमेट्रियोसिस जैसे स्वास्थ्य मुद्दों' को मुख्य कारण बताया है
  • 84% कामकाजी महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान रूढ़िवादिता/जजमेंट का सामना करना पड़ा है जैसे कि उन्हें पूजा स्थलों या रसोई जैसे पवित्र स्थानों के पास न जाने के लिए कहा जाता है या यहां तक कि अपने सैनिटरी नैपकिन को छिपाने के लिए भी कहा जाता है
  • 66% कामकाजी महिलाओं को लगता है कि समाज एंडोमेट्रियोसिस से पीड़ित महिलाओं को शादी के लिए अनुपयुक्त मानता है
  • 67% कामकाजी महिलाओं का कहना है कि ब्रेस्‍ट/सर्वाइकल/गर्भाशय के कैंसर के बारे में बात करना अभी भी समाज में वर्जित माना जाता है

 

निष्कर्ष इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि पीसीओएस, स्तन कैंसर और एंडोमेट्रियोसिस जैसी आमतौर पर होने वाली समस्याओं को लेकर चर्चा अभी भी वर्जित मानी जाती है। यह भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति को दयनीयता को दर्शाता है।

एमक्योर फार्मास्युटिकल्स की कार्यकारी निदेशक, सुश्री नमिता थापर ने कहा, "जब इस जनवरी हमने महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा हमारा यूट्यूब टॉक शो, अनकंडिशन योरसेल्फ शुरू किया, तो हमने महसूस किया कि महिलाओं को शो पर बुलाना और उनके स्वास्थ्य के बारे में चर्चा करना बड़ी चुनौती थी। इसने हमें अध्ययन कराने और जागरूकता एवं निदान से जुड़ी हमारी पहलों को गति देने के लिए प्रेरित किया। कार्यबल में महिलाओं को शामिल करने के लिए हमने कॉर्पोरेट क्षेत्र में जो प्रगति की है, उसके बावजूद महिलाओं के स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे अभी भी तर्कहीन वर्जनाओं से जुड़े हैं। हमारे अध्ययन के निष्कर्ष महिलाओं के स्वास्थ्य के मुद्दों से संबंधित गलत धारणाओं और अतार्किक सामाजिक वर्जनाओं को प्रकट करते हैं, यहां तक कि इससे विभिन्न क्षेत्रों में भारत की व्हाइट-कॉलर जॉब्स करने वाली महिलाएँ प्रभावित हैं।"

सुश्री थापर ने आगे बताया, ''अध्ययन से संकेत मिलता है कि स्वास्थ्य के मुद्दों के अलावा, ऐसी कई पेशेवर और सामाजिक रूढ़ियाँ हैं जिनका महिलाओं को सामना करना पड़ता है और जो उनके पेशेवर प्रदर्शन को प्रभावित करने का कारण बन सकती हैं। अज्ञानता, अनभिज्ञता और स्वीकृति की कमी इन मुद्दों के निदान और हल को और अधिक कठिन बना देगी। एक जिम्मेदार समाज के रूप में, इन मुद्दों को स्वीकारना और इन्‍हें मुख्‍यधारा का विषय बनाना अनिवार्य है। हमें उम्मीद है कि कॉरपोरेट इंडिया अपने महिला कर्मचारियों को सशक्त बनाने पर ध्यान देगा और देश भर में अपने समकक्षों को संवेदनशील बनाने को प्राथमिकता देगा।''

अध्ययन में पाया गया है कि भले ही सर्वेक्षण में शामिल लगभग आधी कामकाजी महिलाएं या तो स्‍वयं इनफर्टिलिटी, ब्रेस्‍ट कैंसर और पीसीओएस जैसी समस्‍याओं से पीडि़त हैं या उनका कोई जानने वाला इन समस्‍याओं से पीडि़त है, फिर भी वे इन स्वास्थ्य समस्‍याओं पर चर्चा करने से हिचकिचाती हैं।

75% कामकाजी महिलाओं ने बताया कि उनके नियोक्ता स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान में मदद के लिए पहल कर रहे हैं, अध्ययन में यह भी पाया गया कि उनमें से 80% से अधिक ने महसूस किया कि महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के मामले में उनके पुरुष सहयोगियों में संवेदनशीलता की कमी है।

इसके अलावा, 52% कामकाजी महिलाओं को काम के साथ स्वास्थ्य का प्रबंधन करना मुश्किल लगता है। विभिन्न क्षेत्रों में से, खुदरा क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए यह संख्या सबसे अधिक 67% थी।

सर्वेक्षण से पता चला कि हर चार कामकाजी महिलाओं में से तीन पर काम से ज्यादा परिवार को प्राथमिकता देने का दबाव होता है। मुंबई में सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश कामकाजी महिलाओं (80%) का कहना है कि उन पर काम के बजाय परिवार को प्राथमिकता देने का दबाव होता है। क्षेत्रों के बीच, यह शैक्षिक क्षेत्र है जहां इस क्षेत्र से सर्वेक्षण की गई कामकाजी महिलाओं के एक बहुत बड़े प्रतिशत (92%) ने उल्लेख किया है कि उन पर परिवार को काम से आगे रखने के लिए दबाव डाला जाता है।

कामकाजी महिलाओं के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और चिकित्सा दृष्टिकोण पर एमक्योर फार्मास्युटिकल्स के अध्ययन के लिए, इप्सोस इंडिया ने कामकाजी महिलाओं के स्वास्थ्य के मुद्दों और समाज और कॉर्पोरेट जगत में इससे जुड़ी वर्जनाओं के बारे में जानकारी एकत्र की। इस लेख में उद्धृत आंकड़े इप्सोसइंडिया द्वारा ऑनलाइन सर्वेक्षण के माध्यम से व्‍हाइट-कॉलर भूमिकाओं में 25-55 वर्ष की आयु वर्ग में 1000 कामकाजी महिलाओं के बीच एकत्र किए गए आंकड़ों के अनुसार हैं, जो एमक्योर के सहयोग से तैयार की गई एक संरचित प्रश्नावली पर आधारित है।

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